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“वैदिक काल (Vedic Age) का इतिहास | Society, Religion, Economy & Literature Notes for UPSC in Hindi”

“वैदिक काल (Vedic Age) का इतिहास  Society, Religion, Economy & Literature Notes for UPSC in Hindi”

वैदिक काल

 

वैदिक काल भारतीय इतिहास का वह प्राचीन समय है जब आर्यों का आगमन हुआ और उन्होंने उपमहाद्वीप में समाज, धर्म और संस्कृति की नींव रखी। यह काल लगभग 1500–500 .पू. का माना जाता है 

इस काल की जानकारी मुख्य रूप से वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद से प्राप्त होती है। वेद न केवल धार्मिक अनुष्ठानों और देवताओं का वर्णन करते हैं, बल्कि समाज, प्रशासन, आर्थिक जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों का भी विस्तृत चित्र प्रस्तुत करते हैं

ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक काल में समाज, प्रशासन और आर्थिक संरचना क्रमिक रूप से विकसित हुई, जिसने भारतीय सभ्यता के प्रारंभिक ढांचे को आकार दिया

lवैदिक शब्द वेद से बना है, वेद का अर्थ होता है ज्ञान, इस काल को वैदिक काल इसलिए भी कहा गया क्योंकि इस काल के बारे में हमको जानकारी वेदों से मिलती है 

lसिंधु सभ्यता के पश्चात विकसित हुए काल को वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता के नाम से जाना जाता है

lआर्यों के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन की जानकारी हमें वेदों से मिलती है, इसलिए इस काल को वैदिक काल कहा जाता है

 

आर्य शब्द का अर्थ

आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ होता है

 

आर्यों का मूल निवास स्थान

आर्यों के मूल निवास स्थान के बारे में मतैक्य नहीं है 

 

अलग-अलग विद्वानों द्वारा आर्यों के मूल निवास स्थान के बारे में  अलग-अलग विचार दिए गए हैं :-

 

उत्तरी ध्रुव

पंडित बाल गंगाधर तिलक

मध्य एशिया

मैक्स मूलर

तिब्बत

पंडित दयानंद सरस्वती

कश्मीर

एल.डी.कल्ल

हंगरी

पी गाइल्स

जर्मनी

पेन्का व हर्ट

सप्त सैंधव देश

डॉ. संपूर्णानंद एवं डॉ. अविनाश चंद्र

मुल्तान

डीएस त्रिवेदी

पामीर पठार

मेयर

दक्षिणी रूस

ब्रिटिश टीम

 

 

lबोगज़कोई के चौदहवीं शताब्दी ई.पू. के अभिलेखों में वैदिक देवताओं के समान नामों का उल्लेख मिलता है। यह संकेत देता है कि आर्यों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा पश्चिम एशिया (संभवत: ईरान क्षेत्र) से भारत की ओर आई। हालांकि, यह प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, बल्कि भाषाई और सांस्कृतिक समानताओं के आधार पर संभावित आगमन की ओर इशारा करता है

lऋग्वेद तथा ईरानियों के धर्म-ग्रंथ जेंद अवेस्ता में बड़ी समानता पाई जाती है

lयूरोप की भाषाएं,संस्कृत तथा ईरानी भाषा एक ही भाषा परिवार का हिस्सा है इस सिद्धांत का विचार सर विलियम जॉन्स ने दिया था 

 

वैदिक समाज की विशेषताओं पर एक नज़र 

lआरंभिक समाज गणतंत्र और सामूहिक निर्णय पर आधारित था

lगोत्र आधारित परिवार व्यवस्था 

lसमाज में सामूहिक उत्सव, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान महत्वपूर्ण

lपारिवारिक और गांव-केंद्रित समाज

lचार प्रमुख वर्ग: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र

lउत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था और जाति आधारित सामाजिक अंतर स्पष्ट रूप से विकसित हुआ

lपंचजन गाँव के पांच प्रमुख सदस्य होते थे

lग्राम, ग्राम संघ और जनपद में पंचायत निर्णय महत्वपूर्ण

lन्याय, कर संग्रह, भूमि विवाद और सामाजिक नियमों में पंचजन की भूमिका

lराजा और पंचजन मिलकर सामाजिक और प्रशासनिक निर्णय लेते थे

lगुरुकुल में वेद, संस्कार, युद्ध कौशल, प्रशासन और धर्म की शिक्षा दी जाती थी

lप्रमुख देवता: इन्द्र (वर्षा और युद्ध), अग्नि (यज्ञ), सूर्य (जीवन), वरुण जल, आकाश और धर्म (सत्य-न्याय) के रक्षक, वायु (हवा)

lउत्तर वैदिक काल में दार्शनिक विचार और उपनिषद का उदय

lवैदिक काल में कृषि प्रमुख आर्थिक गतिविधि थी, जिसमें मुख्य फसलें गेहूं, जौ, ज्वार और दलहन शामिल थीं

lपशुपालन: गाय, बकरी, भेड़, ऊँट

lवैदिक काल में गाय को अघन्या माना जाता था 

lहस्तकला: हथियार, बर्तन, कपड़ा, आभूषण

lप्रारंभिक मुद्रा: पशु और वस्तु

lजलवायु और नदी तंत्र पर आधारित कृषि

lआरंभिक वैदिक समाज में महिलाओं की स्थिति अत्यंत सम्माननीय थी। उन्हें शिक्षा प्राप्त करने, वेदों के अध्ययन तथा यज्ञ-कर्मों में सहभागी बनने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी। वे न केवल पारिवारिक जीवन की धुरी थीं, बल्कि धार्मिक एवं बौद्धिक क्षेत्र में भी समान रूप से प्रतिष्ठित थीं। किंतु उत्तर वैदिक काल में समाज की संरचना में परिवर्तन के साथ-साथ महिलाओं की भूमिका सीमित होती चली गई, और उनकी सक्रियता मुख्यतः गृहस्थ एवं पारिवारिक क्षेत्र तक सिमट गई

lसामाजिक जीवन में सहयोग और सामूहिकता महत्वपूर्ण

lआर्यों की भाषा संस्कृत थी, जिसका प्रयोग मुख्यतः  वेदों की रचना में हुआ

lभाषा और धर्म ने समाज में सांस्कृतिक एकता बनाई

lसंगीत और गायन: सामवेद में मंत्र संगीत

lहस्तकला और चित्रकला का प्रारंभिक विकास

lनियमों का पालन धर्म और यज्ञ पर आधारित

lजाति, वर्ण और सामाजिक कर्तव्यों के आधार पर निर्धारित कानून

lसोमरस आर्यों के प्रमुख पेय पदार्थों में से एक था

lवैदिक काल में अधिकांश शासकीय प्रणाली राजतंत्र पर आधारित थी, हालांकि कुछ गणराज्यों का भी उद्भव हुआ

lवैदिक काल में गाय को अघन्या माना जाता था 

lवैदिक काल में जीविकोपार्जन के लिए वेदो को पढ़ाने वाले को उपाध्याय बोला जाता था

वैदिक काल की प्रशासनिक इकाई

वैदिक काल में प्रशासनिक संरचना अपेक्षाकृत सरल और वंश/कुल आधारित थी। छोटे-छोटे गाँव या बस्तियाँ एक साथ मिलकर पंचजन या ग्राम समुदाय बनाते थे, जिनका नेतृत्व गाँव के वरिष्ठ पुरुष या पंच करते थे। बड़े क्षेत्रों का नियंत्रण राजा के हाथ में था, जो सैन्य और न्यायिक मामलों में प्रमुख भूमिका निभाता था। राजा के सहायक के रूप में विभिन्न अधिकारी नियुक्त होते थे, जैसे महासेनापति (सैनिकों के प्रमुख), कोषाध्यक्ष और न्यायाधीश, जो प्रशासनिक और सैन्य कार्यों में मदद करते थे। प्रशासनिक निर्णय अक्सर सामूहिक सभा और परिषद में मिलकर लिए जाते थे। ऋग्वेद और अन्य वैदिक ग्रंथों में इन पदों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का उल्लेख मिलता है, जो प्रारंभिक राज्य संरचना और शासन के विकास को दर्शाता है

 

वैदिक काल की प्रशासनिक इकाई का आरोही क्रम निम्न प्रकार है:-

 

1. कुल

2. ग्राम

3. विश्

4. जन

5. राष्ट्र(जनपद)

वैदिक काल की राज्य प्रणाली

वैदिक काल में राज्य को विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित किया गया था, जिनमें मध्य क्षेत्र राजा, उत्तर क्षेत्र विराट, दक्षिण क्षेत्र भोज, पूर्व क्षेत्र सम्राट और पश्चिम क्षेत्र सर्वत द्वारा शासित होता था। इस व्यवस्था से केंद्रीय और क्षेत्रीय प्रशासन का संतुलन बना रहता था और शासन तथा सुरक्षा सुचारू ढंग से सुनिश्चित होती थी

 

दिशा

शासित

मध्य(केंद्रीय)

राजा द्वारा शासित

उत्तर

विराट द्वारा शासित

दक्षिण

भोज द्वारा शासित

पूर्व

सम्राट द्वारा शासित

पश्चिम

सर्वत द्वारा शासित

 

वैदिक कालीन अधिकारी

वैदिक काल में राज्य और प्रशासन सुचारू रूप से चलाने के लिए विभिन्न अधिकारी नियुक्त थे। इनमें ग्रामानी गाँव का प्रधान, पुरोहित धार्मिक सलाहकार, सेनानी सेना प्रमुख, वज्रपति चरागाह प्रमुख, महिषी राजा की मुख्य रानी, सुता सारथि, संग्रहिती कोषाध्यक्ष और कुलपति परिवार या कुल के प्रमुख के रूप में कार्य करते थे

वैदिक कालीन रत्नियो(अधिकारियों) का उल्लेख निम्न प्रकार है:-

 

रत्निन(अधिकारीगण)

कार्य

ग्रामानी

गांव प्रधान

पुरोहित

मुख्य पुजारी,परामर्शदाता

सेनानी

सेना प्रमुख

वज्रपति

चरागाह प्रमुख

महिषी

राजा की मुख्य रानी

सुता

सारथि

संग्रहिती

कोषाध्यक्ष

कुलपति

परिवार का मुखिया

भागदुध

राजस्व एकत्र करने वाला अधिकारी

दूत

सन्देश-वाहक

पलागल

विदूषक

तक्षण

बढ़ई

अक्षावाप

लेखपाल

जीवाग्रिभा

पुलिस का अधिकारी

मध्यमासी

मध्यस्थ

आर्यों के पंचजन

वैदिक समाज में प्रमुख पंचजन या पाँच आर्य कुल थे: यदु, पुरु, अनु, तुर्वस और द्रुहु, जो सामाजिक और राजनीतिक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे

1. यदु 

2. पुरु 

3. अनु 

4. तुर्वस

5. द्रुहु 

वैदिक कालीन आर्थिक जीवन

1.

कृषि

lवैदिक समाज की अर्थव्यवस्था में कृषि सबसे महत्वपूर्ण आधार थी

lप्रमुख फसलें: जौ (यव), गेहूँ, तिल, दलहन और चावल

lखेती के तरीके: हल और बैल का प्रयोग कर खेत जोते जाते थे

lसिंचाई के साधन: नदियाँ, कुएँ और तालाब

lखेती में मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए गोबर और प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल होता था

lकृषि उपकरण: कुदाल, हंसिया, कुल्हाड़ी आदि का प्रयोग

 

2.

पशुपालन

lपशुपालन वैदिक समाज की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा था

lमुख्य पालतू पशु: गाय, भेड़, बकरी, घोड़ा और ऊँट

lगाय का विशेष धार्मिक और आर्थिक महत्व था

lवैदिक काल में पशुपालन से दूध, घी और अन्य पशु-उत्पाद प्राप्त होते थे, जो जीवन-निर्वाह और व्यापार दोनों में उपयोगी थे

 

3.

व्यापार और उद्योग

lप्रारंभिक व्यापार वस्तु विनिमय पर आधारित था

lबाद में सोना, चांदी और आभूषण मुद्रा के रूप में भी प्रयोग किए गए

lआंतरिक व्यापार: गाँवों और नगरों के बीच सामान का लेन-देन

 

4.

हस्तकला और उद्योग

lहथियार निर्माण, बर्तन, कपड़ा, आभूषण

lलोहे और अन्य धातुओं से अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण

lव्यापारिक गतिविधियाँ नदियों और मार्गों के माध्यम से होती थीं

 

5.

राजा की भूमिका

lराजा के पास कर और नजराना प्राप्त होता था, जिसे सामूहिक कार्यों और सुरक्षा में लगाया जाता था

 

वेद 

वेद आर्यों के जीवन और संस्कृति का मूल स्रोत हैं, जिनमें धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, देवताओं, नैतिक शिक्षा और सामाजिक नियमों का विस्तृत विवरण मिलता है। ये ग्रंथ वैदिक समाज की ज्ञान, परंपरा और धार्मिक चेतना को उजागर करते हैं

lवेदों का अर्थ ज्ञान है 

lवेद गद्य और पद्य दोनों में लिखे गए हैं  

lवेदो को श्रुति भी कहा जाता है, वेद-गुरु अपने शिष्यों को सुनाते थें,यह परंपरा चलती रहती थी, पहले वेद लिखित रूप में नहीं थें

lमुनि वेदव्यास ने वेदों का संकलन 4 भाग में किया,क्रमश

 

1. ऋग्वेद 

2. सामवेद 

3. यजुर्वेद

4. अथर्ववेद  

वेदत्रयी 

ऋग्वेद,यजुर्वेद व सामवेद को वेदत्रयी कहा गया है 

 

वेद के भाग 

प्रत्येक वेद के चार भाग होते हैं

 

1.

संहिता

संहिता से तात्पर्य वैदिक मंत्रों के संकलित रूप से है

 

2.

ब्राह्मण ग्रंथ

ब्राह्मण ग्रंथ वैदिक मंत्रों की व्याख्या करते है, वेदों में देवताओ के सूक्त है, जिनको वस्तु, व्यक्तिनाम या आध्यात्मिक शक्ति मानकर कई व्याख्यान बनाए गए है, ब्राह्मण ग्रंथ इनमे मदद करते है 

यथा:- 

1.

विद्वांसो हि देवा: (शतपथ ब्राह्मण) - विद्वान ही देवता हैं

2.

यज्ञो वै विष्णुः (शतपथ ब्राह्मण) - यज्ञ ही विष्णु है

 

3.

आरण्यक

गद्य खंड, इनका अध्ययन वनो (अरण्य) में किया जाता था

 

4.

उपनिषद

उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है विद्या प्राप्त करने के लिए शिष्य का गुरु के समीप बैठना, उपनिषद को वेदांत भी कहा जाता है

 

ऋग्वेद

lऋग्वेद में स्तोत्रों को संकलित किया गया है 

lऋग्वेद में 1028 सूक्त (ऋचाएं) संकलित हैं  

lऋग्वेद 10 मंडलों में विभाजित है

lऋग्वेद मूलतः मौखिक परंपरा में संरक्षित था; ऋग्वेद को बाद में विभिन्न लिपियों में अंकित किया गया, जिनमें ब्राह्मी लिपि भी शामिल है

lऋग्वेद में 10580 मंत्र है 

lऋग्वेद के मंत्रों को उच्चारित करके यज्ञ संपन्न कराने वाले पुरोहित को होतृ (होता) कहा जाता था 

 

ऋग्वेद के दस मंडल एवं उनके रचियता

ऋग्वेद के दस मंडल हैं, जिनमें प्रत्येक मंडल में विभिन्न ऋषियों द्वारा रचित स्तुतियाँ और मंत्र संकलित हैं। ये मंडल ऋग्वैदिक समाज, देवताओं और यज्ञों के ज्ञान का मुख्य स्रोत हैं और आर्यों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना को प्रदर्शित करते हैं

 

 

मंडल

रचियता

प्रथम

अनेक ऋषि

द्वित्तीय

गृत्समद ऋषि

तृत्तीय

विश्वामित्र ऋषि

चतुर्थ

वामदेव ऋषि

पंचम

अत्रि ऋषि

षष्ठ

भारद्वाज ऋषि

सप्तम

वशिष्ठ ऋषि

अष्ठम

कण्व एवं आंगिरस ऋषि

नवम

अनेक ऋषिगण

दशम

अनेक ऋषिगण

 

lऋग्वेद के तीसरे मंडल में गायत्री मंत्र वर्णित है, गायत्री मंत्र के रचनाकार विश्वामित्र हैं, गायत्री मंत्र सूर्य देवता(सविता) को समर्पित है 

lऋग्वेद के नौवें मंडल के सभी मंत्र जो कि 114 हैं, सोम को समर्पित हैं

lऋग्वेद में सप्त सिंधु प्रदेश का उल्लेख है, जो आर्यों का प्राचीनतम निवास स्थान था और मुख्यतः पंजाब एवं कश्मीर में फैला था

lइस क्षेत्र की सात प्रमुख नदियाँ ऋग्वेद में वर्णित हैं : -

1. सरस्वती

2. विपाशा

3. परुष्णी 

4. अस्किनी 

5. सिंधु  

6. विवस्ता

7. शुतुद्री 

lऋग्वेद के प्रारंभिक मंडलो में तीन वर्ण उल्लेखित है 

1. ब्रह्मा

2. क्षत्र 

3. विश 

lऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में शूद्र शब्द उल्लेखित है

lदसवें मंडल में औषधि का वर्णन भी मिलता है

lगोत्र शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में हुआ

lगोत्र शब्द गोशाला के लिये प्रयोग किया जाता था 

lऋग्वेद में सर्वाधिक 250 सूक्त इंद्र को समर्पित हैं 

lऋग्वेद में अग्नि को 200 सूक्त समर्पित हैं

lऋग्वेद के अनुसार सृष्टि हिरण्यगर्भ से उत्पन्न हुई है 

lऋतु धारणानुसार ब्रम्हांड नियमित मार्ग पर चलता है, दिवस के बाद रात्रि, ग्रीष्म, शीत, वर्षा आदि ऋतुएँ आती है, ऋतु के अनुसार रह कर प्रकृति  के नियमों का पालन करें 

lऋग्वैदिक काल  में सोने के हार को ही निष्क कहते थे, कालांतर में निष्क का प्रयोग सिक्के के रूप में हुआ

lऋग्वेद में लोहे का उल्लेख नहीं मिलता है

lऋग्वेद में सभा शब्द का उल्लेख 8 बार मिलता है, समिति का 9 बार उल्लेख मिलता है, सभा को उच्च कुलीन व्यक्ति सुशोभित करते थे जबकि समिति में साधारण जन शामिल थे

lऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद है  

lआयुर्वेद धनवंतरी से संबंधित है, पतंजलि, बाणभट्ट, सुश्रुत आदि इसके प्रमुख रचियताओं में से एक हैं

 

ऋग्वेद में उल्लेखित नदियाँ

 

गंगा

एक बार उल्लेख

यमुना

तीन बार उल्लेख

सिंधु (हिरण्यनी)

सर्वाधिक उल्लेख

सरस्वती (मातेतमा,देवीतमा, नदीतमा)

सबसे पवित्र नदी

 

ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ

ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ वेदों के अनुष्ठान और यज्ञ-संहिता का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथों में ऐतरेय ब्राह्मण और कौषीतकी ब्राह्मण शामिल हैं, जो यज्ञों के आयोजन, विधि और धार्मिक अनुष्ठानों का मार्गदर्शन देते हैं

1.

ऐतरेय ब्राह्मण 

ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद से संबंधित एक प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथ है, यह ग्रंथ उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000–600 ईसा पूर्व) में विकसित हुआ। इस काल में यज्ञ और अनुष्ठानों का महत्व बढ़ गया था और समाज में धार्मिक, सामाजिक और नैतिक नियमों का व्यवस्थित रूप आवश्यक हो गया था। ऐतरेय ब्राह्मण में यज्ञों के उद्देश्य, विधि, मंत्र और उनका सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व विस्तार से वर्णित है। यह ग्रंथ उत्तर वैदिक काल की धार्मिक परंपराओं, कर्मकाण्ड और ब्राह्मण वर्ग की भूमिका को समझने का प्रमुख स्रोत है

2. 

कौषीतकी ब्राह्मण 

कौषीतकी ब्राह्मण ऋग्वेद से संबंधित एक प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथ है, जिसमें यज्ञ, अनुष्ठान और धार्मिक विधियों का विस्तृत विवरण मिलता है। यह ग्रंथ वैदिक समाज में यज्ञ के आयोजन, मंत्र प्रयोग और धार्मिक आचार को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है

 

यजुर्वेद

lयजुर्वेद में यज्ञ संबंधी विधि-विधानों एवं कर्मकाण्डों का वर्णन किया गया है, यजुर्वेद पद्य एवं गद्य दोनों में मिलता है

lयजुर्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण है

lशतपथ ब्राह्मण में पुर्नजन्म का सिद्धांत, पुरुषमेध वर्णित है, राजसूय यज्ञ का उल्लेख भी शतपथ ब्राह्मण में मिलता है

lयजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद है 

lधनुर्वेद अस्त्र-शस्त्र से संबंधित है, द्रोणाचार्य, विश्वामित्र, कृपाचार्य इससे संबंधित प्रमुख आचार्य हैं

lइशोपनिषद यजुर्वेद का अंतिम भाग है, यह आध्यात्मिकता से संबंधित है

 

यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं जो क्रमशः कृष्ण यजुर्वेद एवं शुक्ल यजुर्वेद है

कृष्ण यजुर्वेद

lकृष्ण यजुर्वेद दोनों स्वरूपों पद्य,गद्य में है 

lकृष्ण यजुर्वेद में श्लोकों की व्याख्या भी मिलती है

lकृष्ण यजुर्वेद की प्रमुख शाखा तैत्तरीय,व मैत्रायणी है

lकठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद का उपनिषद है 

lकठोपनिषद में यम तथा नचिकेता का संवाद है

शुक्ल यजुर्वेद

lशुक्ल यजुर्वेद पद्य में मिलता है

lवाजसनेय शुक्ल यजुर्वेद की संहिताओं को बोला जाता है

जाबालोपनिषद

जाबालोपनिषद यजुर्वेद से संबंधित उपनिषद है, जो यज्ञ और अनुष्ठानों के आध्यात्मिक एवं दार्शनिक अर्थ को स्पष्ट करता है। जहाँ यजुर्वेद मुख्यतः कर्मकांड संबंधी नियम और अनुष्ठानों का विवरण देता है, वहीं जाबालोपनिषद उनमें निहित आध्यात्मिक ज्ञान और आत्मा के स्वरूप को समझाता है

जाबालोपनिषद में चार आश्रम का उल्लेख मिलता है:-

1.ब्रह्मचर्य (25 वर्ष तक)

2.गृहस्थ( 25-50)

3.वानप्रस्थ(50-75) 

4.संन्यास(75-100)

 

सामवेद

lसामवेद में यज्ञों में बोले जाने वाले मंत्रों को संग्रहित किया गया है

lमंत्र उच्चारण करने वाले व्यक्ति को उदगाता बोला जाता था

lसामवेद में कुल छंदों की संख्या 1810 हैं, 75 श्लोकों के अतिरिक्त शेष सभी श्लोक ऋग्वेद से लिए गए हैं, यह संगीत से संबंधित है 

lसामवेद के ब्राह्मण ग्रंथ पंचविश, ताण्डय, जैमिनीय है 

lगंधर्व वेद सामवेद का उपवेद है यह भरत, नारद मुनि से संबंधित है इसमें गायन, नृत्य आदि वर्णित हैं

अथर्ववेद

lअथर्ववेद में तंत्र-मंत्र, आयुर्वेद इत्यादि का वर्णन है

lमंत्रोचार करने वाले को ब्रह्मा कहा जाता था

lपरीक्षित को मृत्यु लोक का देवता अथर्ववेद में कहा गया है

lसभा(न्यायिक कार्य) और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है

lअथर्ववेद की दो शाखाएं पिप्पलाद एवं शौनक हैं

lसत्यमेव जयतेमुण्डक उपनिषद् से लिया गया है, जो अथर्ववेद का एक भाग है

lअथर्ववेद का ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ ब्राह्मण हैं

lस्थापत्य वेद अथर्ववेद का उपवेद है इसके रचयिता विश्वामित्र हैं, इसमें वास्तु शास्त्र इत्यादि का वर्णन है 

उपनिषद

lउपनिषद ब्राह्मण ग्रंथों के भाग ही होते हैं, उपनिषद का अर्थ गुरु के समीप एकांत में बैठकर गूढ़ विषयों का अध्ययन करना होता है 

lउपनिषदों में जैसा कर्म वैसा ही फल मिलता है जैसे सिद्धांतों का वर्णन है

lउपनिषद मुख्यतः दर्शन पर आधारित है 

lउपनिषदों को ही वेदांत कहा गया

lउपनिषद में मोक्ष के बारे में उल्लेख मिलता है

lउपनिषद दर्शन पर पुस्तके हैं, उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है

lप्रथम बार मोक्ष की चर्चा उपनिषद से मिलती है 

पुराण

पुराण प्राचीन धर्मग्रंथ हैं, जो वैदिक काल की धार्मिक परंपराओं, ईश्वर, ब्रह्मांड, देवता, ऋषि और नैतिक शिक्षाओं का सरल और जनसुलभ रूप में वर्णन करते हैं

पुराणों की संख्या अट्ठारह हैं :-

1. मत्स्य

2. अग्नि 

3. .नारद 

4. पदम 

5. लिंग 

6. गरुड़

7. कूर्म 

8. ब्रह्मा-वैवर्त 

9. स्कंध 

10. मार्कण्डेय

11. भविष्य

12. भागवत 

13. ब्रह्मांड 

14. ब्रह्मा 

15. वामन 

16. वराह 

17. विष्णु 

18. वायु 

16 संस्कार

16 संस्कार जीवन के प्रमुख धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान हैं, जो जन्म से मृत्यु तक व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास को दिशा देते हैं। इन संस्कारों की परंपरा वैदिक काल से आरंभ हुई थी और वे वैदिक धार्मिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों पर आधारित हैं, जैसे जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन, उपनयन, विवाह और अंत्येष्टि

निम्नलिखित 16 संस्कार बताये गए हैं :-

1. गर्भाधान

2. पुंसवन

3. सीमन्तोनयन 

4. जात-कर्म 

5. नामकरण

6. निष्क्रमण 

7. अन्नप्राशन 

8. चूड़ाकर्म 

9. विद्यारम्भ 

10. कर्णवेध

11. उपनयन 

12. वेदारंभ  

13. केशांत 

14. समावर्तन

15. विवाह

16. अंत्येष्टि

 

गुह्य सूत्र 

गुह्यसूत्र प्राचीन धार्मिक ग्रंथ हैं, जो मुख्यतः गुप्त ज्ञान और संस्कारों से संबंधित हैं। ये ग्रंथ वैदिक काल के बाद विकसित हुए और धार्मिक अनुष्ठानों, कर्मकाण्ड तथा मंत्र-पद्धतियों का व्यवस्थित विवरण प्रस्तुत करते हैं। गुह्यसूत्रों का उद्देश्य सामान्य जनता के लिए धार्मिक ज्ञान और संस्कारों को समझने योग्य रूप में प्रदान करना था

 

गुह्यसूत्र में जन्म से मृत्यु तक के कर्तव्यों और अनुष्ठानों का विस्तृत विवरण मिलता है। इसमें विवाह को जीवन के महत्वपूर्ण कर्तव्यों में गिना गया है और इसके लिए आठ प्रकार की विवाह पद्धतियाँ वर्णित हैं। ये पद्धतियाँ वैदिक काल की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हैं

 

1. ब्रह्म

2. दैव

3. आर्ष 

4. प्राजापत्य

5. आसुर

6. गान्धर्व

7. राक्षस

8. पैशाच

पुरुषार्थ

चार पुरुषार्थ बताये गए हैं

 

1. धर्म 

2. अर्थ 

3. काम 

4. मोक्ष

षड्दर्शन

षड्दर्शन प्राचीन भारतीय दर्शनशास्त्र की छह प्रमुख शाखाएँ हैं, जो जीवन, ब्रह्मांड और मानव के आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक प्रश्नों का विवेचन करती हैं। इन दर्शनशास्त्रों की जड़ें वैदिक काल में निहित हैं, जब ऋषियों ने वेदों के तात्त्विक, धार्मिक और सामाजिक विचारों का विश्लेषण किया। छह दर्शन में न्याय (तर्क और ज्ञान का अध्ययन), वैशेषिक (भौतिक तत्व और पदार्थ का विश्लेषण), सांख्य (पुरुष और प्रकृति का द्वैत), योग (आत्म-अनुशासन और समाधि), मीमांसा (धार्मिक कर्म और अनुष्ठान की व्याख्या), और वेदांत (ब्रह्म और आत्मा की एकता) शामिल हैं। ये दर्शन वैदिक ज्ञान और परंपराओं पर आधारित होकर भारतीय धार्मिक, दार्शनिक और नैतिक विचारधारा का मूल आधार बने

दर्शन

प्रणेता

न्याय

गौतम ऋषि

वैशेषिक

कणाद ऋषि

सांख्य (प्राचीनतम)

कपिल ऋषि

योग

पतंजलि ऋषि

पूर्व मीमांसा

महर्षि जैमिनी

उत्तर मीमांसा

महर्षि बादरायण

वेदांग 

वेदांग वेदों की समझ और अध्ययन को सरल और व्यवस्थित बनाने वाले प्राचीन भारतीय ज्ञान के अंग हैं। वेदांगों का विकास वैदिक काल में हुआ, जब ऋषियों ने वेदों के उच्चारण, व्याकरण, अर्थ और अनुष्ठानों को सुरक्षित और सटीक रूप में संरक्षित करने के लिए इनकी रचना की। वेदांगओं की संख्या 6 हैं : शिक्षा (उच्चारण और स्वरों का अध्ययन), वाक्यविन्यास/व्याकरण (सिंधु/पाठ्य विन्यास), छंद (साम, रचना और छंद विज्ञान), निरुक्त (शब्दों और अर्थों का विवेचन), कल्प (यज्ञ और अनुष्ठान की विधियाँ), और ज्योतिष (काल और ग्रहों का अध्ययन)। ये वेदांग वैदिक ज्ञान और धार्मिक परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित करने का माध्यम रहे

 

वेदांग

संबंधित

स्थिति

शिक्षा

व्याकरण

नाक

व्याकरण

भाषा का शुद्ध प्रयोग

मुख

छंद

छंदो से संबंधित

पैर

कल्प

कर्मकांडो की विधि

हाथ

निरुक्त

शब्द की उत्पत्ति

कान

ज्योतिष

नक्षत्रों से संबंधित

नेत्र


वैदिक काल का विभाजन

वैदिक काल को दो भागों में विभाजित किया जाता है

 

1. ऋग्वैदिक काल या पूर्व वैदिक काल (1500-1000 ईसा पूर्व)

 

2. उत्तर वैदिक काल (1000-600 ईसा पूर्व)

 

1.

ऋग्वैदिक काल या पूर्व वैदिक काल

lअवधि: लगभग 1500–1000 ईसा पूर्व

ऋग्वैदिक काल में भारत की सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक दशा

सामाजिक दशा

lसमाज छोटे समुदाय और कुल आधारित था

lब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग प्रमुख भूमिका में

lपरिवार प्रधान समाज, गोपालन और पशुपालन पर निर्भर

lऋग्वैदिक समाज पितृसत्तात्मक था

lऋग्वेद में आर्य-राजाओं का वर्णन मिलता है 

lऋग्वेद में लोपामुद्रा, सिकता, घोषा, अपाला जैसी विदुषी महिलाओं को वर्णित किया गया है, इन्होने कुछ मंत्रो की रचना की थी

आर्थिक दशा

lपशुपालन प्रधान अर्थव्यवस्था; गाय और भेड़ प्रमुख संपत्ति

lकृषि प्रारंभिक स्तर पर; मुख्यत: धान, जौ और अनाज

lव्यापार सीमित और स्थानीय स्तर पर होता था

lयज्ञ और दान के माध्यम से सामाजिक और धार्मिक लेन-देन

धार्मिक दशा

lधर्म मुख्य रूप से यज्ञ और अग्नि पूजा पर आधारित

lप्राकृतिक शक्तियों (इंद्र, अग्नि, वरुण, सूर्य आदि) की आराधना

lऋचाओं और मंत्रों के माध्यम से धार्मिक अनुष्ठान और स्तुति

lऋषियों और ब्राह्मणों की भूमिका ज्ञान और धर्म संरक्षक के रूप में

2.

उत्तर वैदिक काल

lअवधि: 1000–600 ईसा पूर्व

lवेदों का संकलन और ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषदों का विकास

lसमाज: वर्ण व्यवस्था का विस्तार; पुरुष प्रधान समाज

lधार्मिक जीवन: यज्ञ, अनुष्ठान, देवपूजा में वृद्धि; ऋषियों का महत्व

lसाहित्य: धर्मसूत्र, सूत्रग्रंथ, उपनिषदों में ज्ञान और नैतिक शिक्षा

lअर्थव्यवस्था: कृषि प्रधान, पशुपालन और व्यापार का विकास

lराजनीति: राजाओं की संगठित सत्ता; ग्राम पंचायत का उदय

lशिक्षा: वेदांगों और मंत्रों का अध्ययन

lसामाजिक प्रथाएँ: विवाह, संस्कार और दान-धर्म का महत्व

lविज्ञान: प्रारंभिक ज्योतिष, गणित और समय मापन के प्रयास

lउत्तर वैदिक काल में मृद-भांड लाल रंग में प्रचलित था

lउत्तर वैदिक काल में निष्क तथा शतिमान मुद्राएं प्रचलन में थी

lउत्तर वैदिक काल में लोहे को कृष्ण अयस कहा जाता था 

lउत्तर वैदिक काल में तांबे को लोहित अयस कहा जाता था 

lउत्तर वैदिक काल में हल की रेखा को सीता तथा हल के हिस्से को सिरा कहा जाता था

lउत्तर वैदिक काल में गोत्र प्रचलन में आए

lउत्तर वैदिक काल में इंद्र की जगह प्रजापति सर्वोच्च देवता माने जाने लगे

lउत्तर वैदिक काल में राजसूर्य यज्ञ किया जाने लगा इसका विवरण शतपथ ब्राह्मण में मिलता है

ऋग्वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में अंतर

अवधि:

lऋग्वैदिक काल: लगभग 1500–1000 ईसा पूर्व

lउत्तर वैदिक काल: लगभग 1000–600 ईसा पूर्व

स्रोत ग्रंथ:

lऋग्वैदिक काल: ऋग्वेद

lउत्तर वैदिक काल: यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषद

धार्मिक जीवन:

lऋग्वैदिक काल: प्राकृतिक शक्तियों की पूजा (इंद्र, अग्नि, वरुण); सरल यज्ञ

lउत्तर वैदिक काल: यज्ञ और अनुष्ठान का विस्तार; देवताओं के स्वरूप और विधियों में वृद्धि

सामाजिक जीवन:

lऋग्वैदिक काल: छोटे समुदाय, गोपालन प्रधान, सरल समाज

lउत्तर वैदिक काल: जाति (वर्ण) व्यवस्था, समाज में ब्राह्मणों की प्रमुख भूमिका

राजनीति:

lऋग्वैदिक काल: कुल और जनपद आधारित स्वराज्य, राजा का नेतृत्व

lउत्तर वैदिक काल: राजाओं की संगठित सत्ता, ग्राम और पंचायत का उदय

आर्थिक जीवन:

lऋग्वैदिक काल: पशुपालन प्रधान, प्रारंभिक कृषि

lउत्तर वैदिक काल: कृषि प्रधान समाज, व्यापार और उत्पादन का विकास

साहित्य एवं शिक्षा:

lऋग्वैदिक काल: मंत्र, स्तुति, मौखिक परंपरा

lउत्तर वैदिक काल: वेदांग, धर्मसूत्र, सूत्रग्रंथ, उपनिषद

वैदिक कालीन प्रमुख देवता

वैदिक कालीन प्रमुख देवता निम्नलिखित हैं :-

 

इंद्र (पुरंदर)

पुरों को तोड़ने वाले” — युद्ध, शक्ति, वर्षा और मेघ के देवता; देवताओं के राजा; अंतरिक्ष के अधिपति

अग्नि

पृथ्वी से संबंधित देवता; यज्ञों के माध्यम से देवताओं तक अर्घ्य पहुँचाने वाले; पुरोहितों के देवता

रूद्र

तूफान, वायु और विनाश के प्रतीक; औषधि एवं उपचार के भी देवता

बृहस्पति

देवताओं के पुरोहित एवं ज्ञान के प्रतीक; पृथ्वी लोक के विद्वानों के अधिष्ठाता

वरुण

जल और समुद्र के देवता; नैतिक नियम (ऋत) के रक्षक; आकाश के अधिपति भी माने गए

सरस्वती

ज्ञान, वाणी और नदी की देवी; वैदिक वाणी की प्रतीक

अरण्यानी

वन और प्राकृतिक सौंदर्य की देवी जंगल की देवी

सूर्य

प्रकाश, ऊर्जा और जीवन के स्रोत; आकाश के देवता

विष्णु

सूर्य के तीन पगों से ब्रह्मांड नापने वाले देवता; सौर मंडल से संबंधित

अश्विनीकुमार

औषधियों और चिकित्सा के देवता


वैदिक कालीन नदियों के प्राचीन एवं आधुनिक नाम

नदियों के प्राचीन एवं आधुनिक नाम निम्नलिखित हैं :-

 

प्राचीन नाम

आधुनिक नाम

गोमती

गोमल

अस्किनी

चिनाब

क्रुमु / क्रुभ

कुर्रम

कुभा

काबुल

विवस्ता

झेलम

परुष्णी

रावी

सदानीरा

गंडक

शुतुद्री

सतलज

दृशद्वती (दृषद्वती / दर्सदती)

घग्घर

सुवास्तु

स्वात

विपाशा

व्यास


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